गीता -सरल व्याख्या
जैसा कि हम जानते हैं, गणित का सही हल निकालने के लिये, गणित के
नियमों के अनुसार ही संख्यायों आदि के बीच उचित कोष्टक लगाकर आवश्यक जोड, घटाव
इत्यादि करने होते है। इसी प्रकार यदि आप अपना जीवन सफल और सुखी करना चाहते हैं,
तो आपसे संबधित या आप पर प्रभाव डालने वाले कारको (Factors) के बीच उचित संबध या संतुलन बनाये रखना होगा।
इन कारको को हम मुख्य रुप से 4-कारको के रुप में जानते हैं।
1. परमात्मा-ईश्वर आदि नामो से जानने
में आना वाला तत्व.
2. आत्मा-स्वस्वरुप आदि नामो से जानने
में आना वाला तत्व-या आप स्वंय.
3. शरीर- जिसमे अंतःकरण के रुप में अहम,
बुद्धि, मन व बहिःकरण के रुप में पांचो ज्ञानेंन्द्रिया व पांचो कर्मेन्द्रिया शामिल
हैं । {जिस प्रकार शरीर से अलग जिन वस्तुओं
कि सहायता से हम कार्य करते हैं, उन्हे हम उप-करण(Instruments) कहतें है वैसे ही हमसे अलग परतुं शरीर में
उपस्थित, जिन कारको से आत्मा कार्य करती है
उन्हें अंतः-करण और बहिः-करण कहा गया है।} ।
4. संसार -द्रुश्य व अद्रश्य जगत.
इसमे से प्रथम दो कुटस्थ या अपरिवर्तन शील है व अन्य दो सतत परिवर्तनशील
हैं। इन तथ्यों कि उपेक्षा कर, सामान्यतः हम इनका अनुचित वर्गीकरण निम्न प्रकार से करते
हैं.
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1 |
2 |
3 |
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परमात्मा-ईश्वर |
आत्मा-स्वस्वरुप- (पुरुष) शरीर- |
संसार –(प्रकृति) |
इस प्रकार आत्मा-स्वस्वरुप- और
शरीर को एक मानकर ( मैं , मेरा करते हैं), व संसार को अन्य मानते हैं। पर गीता
इनका (उचित) वर्गीकरण निम्न प्रकार से करने को कहती हैं
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1 |
2 |
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परमात्मा-(ईश्वर)-आत्मा-(स्वस्वरुप) (पुरुष) |
शरीर- संसार–(प्रकृति) |
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चेतन तत्व |
ज़ड पदार्थ |
{गीता में परमात्मा और (जिव)आत्मा कि विशेषतायें जैसे-कुटस्थ, सर्वगत
इत्यादि एक जैसे हैं। फिर भी इनके कर्म और जन्म में एक विशेष अंतर है, परमात्मा
प्रकृति को अपने अधीन कर अवतार लेते हैं और लीलाएं करते है। पर (जिव)आत्मा का जन्म
(प्रकट होना) और कर्म, प्रकृति के अधीन होता हैं। सामान्यतः प्रकृति को
परिवर्तनशील और पुरुष को अपरिवर्तन शील कहा गया है। परतुं जहां प्रकृति के दो भेद
परा-अपरा कहे गये है तो परा प्रकृति अपरिवर्तनशील और अपरा प्रकृति परिवर्तनशील कही
गयी है। इसी प्रकार पुरुष को भी दो प्रकार से कहा गया है। क्षर पुरुष
(परिवर्तनशील) और अक्षर पुरुष (अपरिवर्तनशील) कहा गया है। }
अब यदि हम उपरोक्त वर्गीकरण को आचरण में ले आयें और
अ.
अपने कहलवाने शरीर (इसमें अपनी कही जाने वाली स्थावर-जंगम संपत्ति भी
आ गई) को संसार कि सेवा में लगा दें तो यह कर्म-योग हो गया।
आ.
अपने विवेक से यह मान लें कि शरीर से होने वाली क्रियायें मेरे द्वारा नहीं हो रही तो यह
ज्ञान-योग हो गया।
इ.
अपने कहलवाने शरीर (इसमें अपनी कही जाने वाली स्थावर-जंगम संपत्ति भी
आ गई) को ईश्वर को अर्पण कर दें तो यह भक्ति-योग हो गया।
{गीता कर्म प्रधान है- कर्मयोग के अलावा ज्ञानयोग या भक्तियोग में भी
(आपको) कर्म करने ही हैं, केवल कर्म करते समय आपका भाव (उपरोक्त कहे अनुसार)
अलग-अलग होगा। गीता के अनुसार कर्तव्य कर्म करने से ही इश्वर कि पुजा हो जाती है}
गीता के अनुसार मनुष्य जन्म कि सार्थकता या उद्येश्य परमात्मा के साथ
अभिन्नता अनुभव करना है या उसकी प्राप्ति करना है। वास्तव में ( उपर कहे अनुसार)
हम और परमात्मा एक ही हैं। परतुं हमारी गलती यह हो जाती है कि हम उसे प्राप्त करना
भी संसार कि अन्य वस्तु को प्राप्त करने जैसा कर्मजन्य मानकर, उसे प्राप्त करने के
लिये भजन-पुजन-दान-तप आदि करने लगते हैं। वास्तव में भजन-पुजन-दान-तप आदि में राग-आसक्ति
न रखकर उन्हें संसार से माने हुए संबध को विच्छेद करने के साधन के रुप में
अपनायें तो संसार से संबध विच्छेद होते हि परमात्मा स्वतः सिद्ध प्राप्त है।
गीता कि प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं।
1. गीता भाव प्रधान है, दुसरे शब्दो में यह प्रधानता से करण-निरपेक्ष है
(केवल ध्यान योग में ही इसे करने प्रक्रिया दी गई है)। इस प्रकार कोई भी कर्म करते हुए या करने पर उसका फल, बाहरी आचरण के
आधार पर नहीं होता, प्रत्युत उसे करते समय व्यक्ति के मन में क्या भाव है उसके
आधार पर उसका फल निश्चित होता है। एक ही क्रिया (कर्म) या पदार्थ का उपयोग करते हुए
भाव के अनुसार गीता में अलग-अलग जगह, निम्न बातें आयी हैं ।
अ. भोग-सेवन- भोग- किसी वस्तु, पदार्थ या इंद्रिय सुख का आनंद लेना, उसे भोगना है। इसमें अक्सर लालच, आसक्ति, इंद्रियों की तुष्टि और स्वार्थ का भाव छिपा होता
है।
सेवन- किसी चीज को ग्रहण करना, उपयोग में लाना या उसका सेवन करना (जैसे औषधि या भोजन का सेवन करना)। यह अधिक
नियंत्रित, संयमित,
और आवश्यकता पर आधारित होता है। सेवन
में लालच या आसक्ति की जगह आवश्यकता और संतुलन होता है (जैसे स्वास्थ्य के लिए
भोजन या दवाई लेना)।
गीता वस्तु-पदार्थ का भोग न कर सेवन करने की सलाह
देती है।
ब. कामना-उद्येश्य- कामना का संबंध मन और भावनाओं से होता है।
यह किसी वस्तु, सुख,
स्थिति या व्यक्ति को पाने की मानसिक
इच्छा या लालसा है। कामनाएं अस्थायी और असीमित होती हैं; एक कामना पूरी होती है तो दूसरी नई कामना उत्पन्न
हो जाती है। यह
अक्सर स्वार्थ, सुख-प्राप्ति,
या किसी दुख-कष्ट से बचने की आंतरिक
भावना से आती है। इसके विपरीत उद्देश्य का संबंध बुद्धि, योजना और कार्य से होता है। यह किसी कार्य के
पीछे का मूल विचार, दिशा
या निश्चित लक्ष्य होता है जिसे प्राप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं। यह तार्किक,
स्पष्ट और मापने योग्य होता है। यह
सिर्फ एक चाहत नहीं, बल्कि
एक सुनियोजित दिशा है। यह किसी सार्थक परिणाम, जिम्मेदारी, ज्ञानवर्धन या बड़े लक्ष्य को पूरा करने के
संकल्प पर आधारित होता है।
गीता कामना को त्याग या नियंत्रित कर उद्देश्य के
साथ कर्म करने की प्रेरणा देती है।
स. क्रिया-कर्म- क्रिया शरीर, मन या इंद्रियों द्वारा की जाने वाली कोई भी
सामान्य गतिविधि या हलचल है । यह एक भौतिक या मानसिक प्रक्रिया है जो प्रकृति
(त्रिगुणात्मक प्रकृति) के नियमों के अधीन होती है। जब तक कोई गतिविधि बिना किसी
अहंकार या 'कर्तापन'
के भाव के होती है, वह मात्र एक क्रिया होती है। कर्म वह क्रिया है जिसके साथ मनुष्य का अहंकार (कर्ता
भाव), इच्छा और फल की आसक्ति जुड़ जाती है। गीता
के अनुसार, जब मनुष्य यह
मान लेता है कि "मैं करने वाला हूँ" और उसके पीछे
कोई व्यक्तिगत कामना या फल की लालसा होती है, तब वह साधारण क्रिया 'कर्म' बन जाती है और उसका फल या बंधन उत्पन्न होता है।
गीता स्व व शरीर को अलग-अलग मानती है अतः विवेकी-ज्ञानी व्यक्ती
(जिसका आचरण गीता अनुसार है) द्वारा केवल क्रियाएं होती है कर्म नहीं।
गीता मे इसे अकर्म कहा गया है। अकर्म: कर्म करते हुए भी 'कर्तापन' के भाव का अभाव होना (अर्थात कर्म के फल से न
बंधना, जिससे मुक्ति
मिलती है)। गीता
में ही अन्य कर्म (विहीत कर्म, नियत कर्म) (नियत कर्तव्य): वे कार्य जो
धर्म और कर्तव्य के अनुसार किए जाएं –हैं तथा विकर्म:
शास्त्रों
द्वारा निषेध किए गए या बुरे और पापयुक्त कार्य का वर्णन है।
द. सकाम-निष्काम कर्म-'सकाम' का
अर्थ होता है—किसी कामना, स्वार्थ
या फल की इच्छा के साथ किया गया कर्म। इसमें व्यक्ति किसी विशिष्ट लाभ, पुरस्कार, यश, धन या सांसारिक सुख (जैसे घर, गाड़ी, पद
आदि) की अपेक्षा रखकर काम करता है। यह कर्म व्यक्ति को सांसारिक बंधनों में बांधता
है, क्योंकि फल
मिलने या न मिलने से सुख-दुख पैदा होता है।
'निष्काम' का
अर्थ होता है—बिना किसी कामना, स्वार्थ
या फल की अपेक्षा के किया गया कर्म (निस्वार्थ भाव) । इसमें व्यक्ति फल की चिंता किए बिना
केवल अपने कर्तव्य या धर्म का पालन करता है यह मन को शुद्ध करता है और जीव को
मोह-माया व जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त (मोक्ष की ओर) ले जाता है।
हमे सकाम कर्म और निष्काम कर्म को Head and Tail जैसा विपरीत नहीं समझना चाहिये कि,
एक प्रकार से कर्म कर रहे हैं तो दुसरे प्रकार से कर्म नहीं हो सकता। इस आधार पर
व्यक्ति निष्काम कर्म कर ही नहीं सकता। हमे सकाम कर्म और निष्काम कर्म को
(Light) Spectrum
के दो छोर मानते हुयें जीवन में सकाम
कर्म से निष्काम कर्म कि और बढना चाहिये। जैसे आप परीक्षा कि तैयारी कर रहे है तो
यह सकाम कर्म हो गया और रुचि के अनुसार पाठ्यक्रम से अलग किसी विषय कि अधिक
जानकारी ले ली तो यह निष्काम कर्म हो गया जो अंततः सकाम कर्म से अधिक फलदायी होगा
।
ध्यान रखे निष्काम कर्म न तो निरुद्येश्य होता है न ही ऐसा है कि उसमें
व्यक्ति फल कि परवाह नहीं करता ।
निरुद्येश्य कर्म और फल कि परवाह किये बिना कर्म करना तामसी प्रवृत्ति है। यहां
यह भी याद रखना चाहिये कि कर्म का फल अवश्य होता है, उसे आप चाहे या न चाहें। गीता
में जहां भी कहा गया है कि (इस) कर्म का फल नहीं होता वहां यह अर्थ है कि कर्म से
उत्पन्न फल-स्वरुप परिस्थिती से व्यक्ति सुखी-दुःखी नहीं होता।
श्रीमद्भगवद्गीता 'निष्काम कर्मयोग' का सिद्धांत प्रतिपादित करती है।
इ. समता-विषमता- समता का अर्थ है हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं,
परिस्थितियों
और योग्यताओं के अनुसार न्यायपूर्ण सन्मान, अवसर व संसाधन उपलब्ध कराना है। समता के
विपरीत विषमता है, जिसमे हम अपने राग-द्वेष कि भावना के अनुसार व्यवहार करते है।
गीता में समता का स्वरूप और महत्व- गीता में समता का अर्थ सबसे समान
व्यवहार करना नहीं है (समान व्यवहार तो केवल यमराज कर सकते हैं और करते हैं)। गीता
के संस्कृत श्लोकों में समता के लिये शब्द
“समदर्शी” है, न कि“समवर्ती” । अतः समदृष्टि (सबमें ईश्वर को देखना) रखना है : गीता के अनुसार, ज्ञानी पुरुष विद्या-विनयसंपन्न ब्राह्मण,
गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल—सबको एक ही दृष्टि से देखता है, क्योंकि वह सबमें एक ही परमात्मा का
निवास मानता है।
अंतःकरण की स्थिरता: वास्तविक समता बाहरी परिस्थितियों को
बदलने से नहीं, बल्कि
भीतर से आती है। चाहे मान मिले या अपमान, धन आए या जाए, मन में
कोई हलचल या शोक नहीं होता।
समता ही योग व सर्वोच्च सिद्धि है: आसक्ति को
त्यागकर, सफलता और
असफलता में समान भाव (समत्व) रखते हुए कर्तव्य का पालन करना ही योग है। गीता
में समता को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। जिस व्यक्ति का मन समता में स्थित हो
जाता है, वह जीते-जी
संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है और परब्रह्म को पा लेता है।
फ. धर्म- गीता के संदर्भ में 'धर्म' का अर्थ किसी खास पूजा-पद्धति या मज़हब (Religion) से नहीं है, बल्कि इसका मुख्य अर्थ 'कर्तव्य', 'नैतिकता' और 'स्वभाव'
से है। गीता करणनिरपेक्ष भी है और किसी भी (परमार्थिक)
मार्ग/साधन का न तो
अनुमोदन करती है न निंदा करती है । इसी प्रकार किसी भी साधन करने में अतिरेक न
करने को कहती है (यह साधन में मध्य मार्ग अपनाने को कहती है)।
गीता में धर्म के मुख्य पहलुओं को इस प्रकार समझाया गया है:
स्वधर्म का पालन: व्यक्ति को अपने 'स्वधर्म' (यानी अपनी परिस्थिति, क्षमता और जिम्मेदारी के अनुसार निर्धारित
कर्तव्य) का पालन करना चाहिए।
निष्काम कर्म: फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य
(धर्म) का निर्वाह करना ही सच्चा धर्म है।
सृष्टि और समाज का संतुलन: धर्म वह है जो
समाज में न्याय, सत्य
और संतुलन बनाए रखे। संस्कृत की उक्ति "धारणात् धर्म इत्याहुः" के अनुसार— जो
धारण करने योग्य है और जो मानव को उन्नति की ओर ले जाए, वह धर्म है।
उपसंहार- गीता के अंतिम अध्याय (18.66) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सब
प्रकार के धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण
में आओ, मैं तुम्हें
सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।
इसकी व्याख्या यह भी है कि क्या धर्म है क्या अधर्म है इसकी चितां मत
करो । क्या करने से पुण्य मिलेगा, क्या करने से पाप लगेगा इस का भी विचार मत करो।
यह सब तुम मुझ पर छोड दो और वर्तमान में जो तुम्हे कर्तव्य प्राप्त हुआ है उसे पुर्ण
मनोयोग से निभाओ ।
यही संदेश हम सब पर लागु होता है व हम भी इश्वर के शरणागत होकर अपने
कर्तव्य कर्म करे।
यही गीत की व्याख्या है।