Sunday, November 7, 2021

किशोर गीता 4- सत्- असत् ( Existent and Non-existent )

 

हम जानते हैं चन्द्रमा का जो प्रकाश हमें दिखाई देता है वह सूर्य के कारण है और मात्र सूर्य का परावर्तित प्रकाश है । हम कहते हैं फ्रीज वस्तुयें शीतल करता है और ओवन वस्तुयें गरम करता है। परन्तु इन दोनो मे विद्युत प्रवाह न हो तो हम जानते हैं कुछ भी नही होगा । तो क्या एक ही विद्युत कभी शीतल और कभी गरम प्रभाव उत्पन्न करती है ? यह भी ठीक नही लगता । वास्तव मे विद्युत स्वंय कुछ नही करती पर उसके बल से फ्रीज या ओवन अपनी-अपनी बनावट अनुसार प्रभाव उत्पन्न करते हैं।

हम जो कुछ देख पाते हैं उसके दो भाग हैं सत्-असत् (existent and non-existent)। जो दिखाई देता (या अनुभव होता) है  वह सत् नहीं है लेकिन सत् दिखाई देता है। जो असत् है वह सत् से ही प्रकाशित हो रहा है सत् की अपनी सत्ता नहीं है तथा असत् में जो सत्ता प्रतीत होती है वह सत् के कारण है। अगर सत् अपनी सत्ता हटा ले तो अ-सत् का कोई प्रभाव नहीं रहेगा । सत् का अर्थ है अपरिणामी, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। अ-सत् परिणामी है अर्थात जिसमें परिवर्तन होता है। सत् एक ही है और जितनी वस्तुएं है सब असत् हैं। इस जगत में सब कुछ कारण युक्त है, व्यक्त जगत में हम जो कुछ देखते हैं सत् उसका कारण और आधार है। जब हम कारण की तरफ चलते हैं तब चलते-चलते मूल कारण तक पहुंच जाते हैं।इसके बाद और कोई कारण नहीं पाते हैं वही सत् (आत्मा-परमात्मा) है।

गीता इसी मूल तथ्य को रेखांकित कर कहती है, मनुष्य- शरीर (असत्) नही आत्मा (सत्) है। (इनको अन्य पर्यायवाची नाम, प्रकृति-पुरुष तथा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ से भी समझाया है।) शरीर, आत्मा का व्यक्त रुप, साधन, करण और उपकरण (Instrument of action) मात्र है

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार - यह आठ प्रकार के भेदों वाली 'अपरा' प्रकृति है (जिनसे शरीर बना है)। इससे भिन्न जीव रूप बनी हुई 'परा' प्रकृति है, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है । ।।7.4 - 7.5।। इन दोनों प्रकृतियों के संयोग से ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं । ।।7.6।। सभी प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीच में ही प्रकट दिखते हैं।।।2.28।। प्रकृति और पुरुष – दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो। कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है।।।13.20।।

(इसी प्रकार) शरीर को 'क्षेत्र' कहते हैं और इस क्षेत्र को जो जानता है, उसको ज्ञानी लोग 'क्षेत्रज्ञ' नाम से कहते हैं । ।।13.2।। मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियों के पाँच विषय (चौबीस तत्त्व)  ।।।13.6।। (तथा) इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राण शक्ति) और धृति - इन विकारों सहित यह क्षेत्र है।।।13.7।।

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। ।।3.27।। (इस) तत्त्व को जानने वाला देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं' --ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ'-ऐसा माने। ।।5.8 - 5.9।। जो सम्पूर्ण क्रियाओं को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने-आपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है।।।13.30।। यह पुरुष (आत्मा) स्वयं अनादि और गुणों से रहित होने से अविनाशी परमात्म स्वरूप ही है। यह शरीर में रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।।।13.32।।

यह पुरुष, प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखने (न होकर मानने से) से 'उपद्रष्टा'( गवाह), उसके साथ मिलकर अनुमति देने से 'अनुमन्ता', उसका भरणपोषण करने वाला मानने से 'भर्ता', उसके संग से सुख -दुःख भोगने से 'भोक्ता', और उसका स्वामी मानने से 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूप से यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देह में रहता हुआ भी देह से परे (सम्बन्ध-रहित) ही है।।।13.23।। जीवन में जो कुछ अच्छा या बुरा घटने पर हमारे मन मेँ जो भाव आते हैं या मन में जो हलचल या अशान्ति होती है उन सबके मूल मे यह माना हुआ सम्बन्ध या स्वंय को शरीर मानना ही है।  

इन तत्वों (Principles) - हम शरीर नही आत्माहै, शरीर आत्मा के बल से ही कुछ कर पाता है, पर हम स्वयं (आत्मा) कुछ नही करते तथा कुछ नही भोगते आदि-  को जान ले और जीवन में इन्हें अपना ले तो, जीवन मे हमारे (शरीर के) साथ जो कुछ होता है या शरीर द्वारा होता है उसे हम अपना या अपने द्वारा न मानकर किसी अन्य (शरीर) के साथ या द्वारा हुआ समझेंगे तथा (दुसरे के साथ घटी घटनाएं हमारे मन को प्रभावित न करने से) अनेका-अनेक भावनाओं (अहंकार, अपमान आदि) से स्वयं को बचाकर परम शांन्ति का अनुभव करेंगे/ कर सकते हैं।

(इस प्रकार) बाह्य स्पर्श (शरीर) में आसक्ति रहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। ।।5.21।।

 

Wednesday, October 20, 2021

किशोर गीता 3-नित्य-अनित्य (Eternal- Transit)

 


लगभग 14 बिलियन वर्ष पूर्व पदार्थ, ऊर्जा, काल (time) तथा अन्तराल (space) अस्तित्व मे आये जिसे हम बिग-बेंग (Big Bang) के नाम से जानते हैं तथा भौतिक विज्ञान में अध्ययन करते  हैं। इसके करीब 3 लाख वर्ष पश्चात पदार्थ, ऊर्जा एकत्रित होकर जटिल संरचनाओ- परमाणु, अणु- मे बदलने लगे। उनका तथा उनकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन हम रसायन शास्त्र में करते हैं। अन्ततः पृथ्वी पर करीब 3 बिलियन वर्ष पूर्व कुछ अणुओं ने और विशिष्ट प्रक्रिया कर अत्यधिक जटिल संरचना कर जीव बनाये । इनकी कहानी हम जीव विज्ञान मे पढ़ते हैं।

भौतिक तथा रसायन विज्ञान से जीव विज्ञान की तुलना करें तो हम पाते हैं कि तीनो में पदार्थ और ऊर्जा है, परन्तु जीव मे इसके अतिरिक्त एक विशिष्ट तत्व चेतना (Consciousness) होती है जो की जीव को जड़ (पदार्थ और उर्जा) से अलग करती है। चेतना के संग से जड़- उत्पत्ति, वृद्धि और क्षय  के चक्र मे चलता रहता है, पर स्वयं चेतना मे कोई बदलाव नही होता है। अतः चेतना नित्य(Eternal) है और जड़ (Transit) हैं । गीता मे इसी चेतना को आत्मा (शरीरी” “देही) नाम से कहा गया है (जो जड़- शरीर, देह से अलग है) और उसकी विशेषताएं बताईं गयीं हैं।

अविनाशी (आत्मा) तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश कोई भी नहीं कर सकता । ।।2.17।। अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्त वाले कहे गये हैं 2.18।। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्म रहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता । ।।2.20।। शस्त्र इस शरीरी को काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती । ।।2.23।। सब के देह में यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियों के लिये अर्थात् किसी भी प्राणी के लिये (मृत्यु के कारण) तुम्हें (किसी को भी) शोक नहीं करना चाहिये । ।।2.30।।

चेतना या आत्मा को विज्ञान अभी पूरी तरह से समझ नही पाया है । परन्तु विज्ञान भी इसी प्रकार के अविनाश के सिद्धान्तो को रसायन और  भौतिक शास्त्र में प्रतिपादित करता है और वे प्रयोग से सिद्ध हो चुके हैं । रसायन शास्त्र का द्रव्य मान संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mass) कहता है, क्रियाओं से यद्यपि पदार्थो का स्वरुप बदलता है पर क्रियाओं मे भाग लेने वाले पदार्थो का कुल वजन और क्रियाओं से बनने वाले पदार्थो का कुल वजन समान ही होता है । भौतिक शास्त्र का ऊर्जा संरक्षण का नियम (law of conservation of energy) कहता है ऊर्जा का स्वरुप बदला जा सकता है या बदलता रहता है (प्रकाश ऊर्जा से उष्म ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा से यांत्रिकी ऊर्जा आदि) मगर कुल ऊर्जा का मान बदला नही जा सकता । इसी प्रकार संरक्षण के अन्य कई नियम हैं जैसे-  “रेखीय संवेग का संरक्षण का नियम(Law of Conservation of Linear Momentum) आदि । विशेष,  भौतिकी का E= MC2 , ( E=Energy, M =Mass, C= speed of light)  समीकरण कहता है, पदार्थ और ऊर्जा आपस मे भी बदलते हैं और उनका योग संरक्षित रहता हैं । हम आशा करते हैं जीव विज्ञान मे भी कभी चेतना का संरक्षण का नियम (Law of conservation of Consciousness) आयेगा और गीता मे कही हुई उपरोक्त सभी बातें विज्ञान द्वारा भी सिद्ध हो सकेगीं।   

यद्यपि रसायन तथा भौतिक शास्त्र और गीता मे कही गई बाते हम पूरी तरह समझ न सके फिर भी ये सभी, कुछ विषिष्ट बातों की और इशारा करती है। एक- बदलाव होने का अर्थ नष्ट होना नही है दूसरा -इस बदलाव मे भी कुछ चीजे नही बदलती । अतः बदलाव से न हमे प्रसन्न होना है न दुखी होना है क्योंकि बदलाव का अर्थ होता है एक वस्तु (विचार) का नष्ट होकर दूसरी वस्तु (विचार) का निर्माण होना । इससे भी महत्व पूर्ण है, हमें हो रहे बदलाव में जो स्थिर है उस पर ध्यान देने का अभ्यास करना चाहिये जिससे बदलाव के प्रति आश्चर्य, खेद, प्रसन्नता, क्रोध आदि की भावनाएं न हों । वृद्ध व्यक्ति खेद पूर्वक कहते हैं, हमारे समय में पत्रिकाओं मे कहानियां, उपन्यास धारावाहिक रुप में आती थी । मगर ध्यान से देखे तो वही कहानियां, उपन्यास अब अपने नये स्वरुप में टीवी धारावाहिक में दिखाये जाते हैं। कहानियां, उपन्यास वही हैं केवल माध्यम बदला है। इस दृष्टिकोण का विद्दार्थियों को पढ़ाई मे भी बहुत उपयोग हो सकता है । गणित की एक प्रश्नावली के अलग-अलग प्रकार से कहे गये प्रश्नों मे दी गयी या पूछी गयी जानकारी को एक सूत्र के घटक  के रुप मे पहचानने का अभ्यास करें तो सभी प्रश्न एक जैसे दिखेगें।

गीता में कहा गया है- इन्द्रियों के जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जाने वाले और अनित्य हैं। अर्जुन! उनको तुम सहन करो। ।।2.14।। अर्थात अनित्य (transit) हमेशा बदलता रहेगा । परन्तु यह हमारी जिन्दगी का केन्द्र बिन्दु (Core) न होकर बाहरी आवरण (Peripheral) मात्र है। हमे स्वयं और आसपास मे जो  नित्य (eternal)  है  उस पर ध्यान देना है । इसी वृत्ति से हम, हमारे लक्ष्य से दूर नहीं जायेंगे( will not get distracted) तथा लक्ष्य को कम समय और श्रम से ही प्राप्त कर सकेगें